क्या लिखूं ?

क्या लिखूं ?

क्या लिखूं ?
यही प्रश्न है यक्ष अभी
जो भी आता है जी में
चला जाता है पल में
यही उसूल है ज़िन्दगी का भी
अभी मिली है और
अक्ल आने से पहले ही
ढल जानी है , देखो
फिर भी
इंसान को भागते जाना है
कहाँ जाना है ?
ये कोई नहीं जानता है
अभी बस भीड़ के पीछे पीछे
चलते जा रहा है !
जब महसूस होगा के
रास्ता बरसों पहले छूट गया
तब रोने के सिवा कुछ नहीं होगा
करले हासिल अभी जो करना है तुझे
ऐ मानव !
क़द्र भी करले अभी उनकी
जो खड़े है तेरे खातिर
नहीं तो एक वक़्त वो भी आएगा
जब तू अपनों के सायो को तरसेगा
चलो, यही लिखती हूँ आज
जो सच है
हे मानव!
आज तेरे पास सब कुछ है
तो तुझे क़द्र नहीं है अपनों की
जब होगा नहीं कुछ भी साथ
तब तू मिलेगा बस हाथ
के काश दे पता तू भी अपनों का साथ
मत रहने दे ये मलाल मन में
सुधर जा अभी भी वक़्त है हाथ में
देख!
वो माँ है तेरी
जिसने खुद भूखे रहकर भी
दूध पिलाया था तुमको
खुद राते आँखों में काटकर
आँचल तले सुलाया था तुमको
कितनी ही बार न जाने
खून के आंसू पीकर
हंसाया था तुमको
देख !
ये पिता है तुम्हारा
जिसने ऊँगली पकड
चलना सिखाया था तुमको
हर बार गिरने से
बचाया था तुमको
वृक्ष की तरह अडिग रहकर
आंधी, बारिश, धुप से बचाया था तुमको
देख!
ये पत्नी है तुम्हारी
छोड़कर अपने माँ- बाबा को
आयी थी संग रहने तुम्हारे
सुनी करके उनकी बगिया को
हरा भरा किया आँगन तुम्हारा
अपनी ज़िन्दगी के हर पल में
संजोया था सिर्फ तुम्ही को
हे मानव!
अब तुम्हारी बारी है
बनजा अपनी माँ का सहारा
अपने बाबा का दुलारा
और पत्नी का हमसफ़र
कर लिया कर इनसे भी कभी
मन की दो बाते
कुछ नहीं चाहिए इनको तुमसे
बस थोड़ा सा वक़्त
और थोड़ी सी मुस्कराहट के सिवा
बाते करता है दुनिया भर से इतनी
खिलखिलाता है दुनिया वालो के साथ
वो सब इन्ही की बदौलत है
हे मानव!
अब भी सम्हाल जा वक़्त है
कुछ नहीं रखा है इस अकड़ में
जो तू दिखलाता है इन अपनों को
क्योंकि अकड़ तो मुर्दा भी सकता है
अगर तू ज़िंदा है तो
ज़िंदा बनकर दिखा
अपनों के साथ भी कभी तो वक़्त बिता
यकीन मान
तुझे भी महसूस होगा की
हाँ, अब जीना आया है तुमको
हाँ, अब सीखा है चलना तुमने
हाँ, अब समझा है तू ज़िन्दगी को
वरन तो बस यही कहूँगी की
फिर खुछ नही होगा तेरे हाथ में
जब ये लोग जा चुके होंगे ,
दुनिया वाले मुँह फेर चुके होंगे
और
तू मृत्यु सैया पर अकेले
लेट सोच रहा होगा
की काश!
उनके रहते तुमको
समझ आया होता
की अपना कोण
और पराया कोन था
और तब
तू सोचेगा की क्या लिखू ?
और
यही कविता शायद तू लिखेगा
अपने बच्चो को ज़िन्दगी का पथ दिखाने !

Copyright © Rachana Dhaka

8 Comments

  1. हायनी क्यालिखूँ सोचके इना कुछ लिख दित्त सी… कमाल कारदीए कड़ीए

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