गैरों के भरोसे किसके घर बसे हैं?

एक दिन यूं ही

परायों के देश में

अपनों से दूर

अंधेरे में बैठकर

महसूस हुआ कि

इस अनजान शहर में

अंधेरे कितने अपने लगते हैं

जहां किसी और को

अपना कहने का अधिकार ना हो

वहां उजाले भी कितने पराए लगते हैंl

क्योंकि वो दिखा देते हैं कि

तुम अपने शहर में नहीं

गैर मुल्क में

किसी गैर को आशनां मानकर

मुंह उठाकर चले आए थे

अपना सब कुछ पीछे छोड़कर।

आज वही नाआशना होकर

आपसे मुंह मोड़ चुका है।

क्योंकि जो अपने ही दिल में

अंधेरे लिए फिर रहा हो उसे

औरों के उजाले कैसे बर्दाश्त हों?

तभी!

किसी ने मेरे अंधेरे कमरे में

दस्तक देकर

बत्ती जला दी, साहब!

यही विचार आया कि

बाहरी अंधेरे तो

दूर हो जाते हैं पल में

मगर,

दिल के अंधेरों का क्या करोगे साहब?

कैसे दूर करोगे उनको

जब तक अपने ही परिणय साथी को

अपनाओ के नहीं

जिसको सिर्फ तुम्हारा इंतजा़र है

उसको गले लगाओगे नहीं

भीतर के पल बाहर ढूंढोगे तो

कभी ये खालीपन भर पाओगे नहीं l

फिर तो!

जिंदगी यूं ही

कांटों के साये में गुजरेगी साहबl

क्योंकि यह सही है

कि फूलों की सेज कभी

दिल के अंधेरे मिटा नहीं सकतीl

उसके लिए तो प्रयत्न

आपको स्वयं करने होंगे

खुद ही समझना होगा

अपनी आंखें खोल कर यह देखना होगा

कि कौन अपना है

कौन पराया

जो अपनी जिंदगी जलाकर

आपके लिए रोशनी करने की कोशिश कर रहा है

अपनाना तो होगा उसको

आज खुद आगे बढ़करl

तभी सुकून पाओगे साहब!

यूं मुंह मोड़कर,

नजरें चुरा कर

कब तक अपने और पराए दर्द को

अपनों पर थोपते रहोगे?

कभी पूछा है खुद से

जरा रुक कर?

अंधी दौड़ है साहब

सिर्फ अंधेरों तक ले जाएगी।

जब तक जे़हन की निशा को

अपने दिल के अंधेरों को

दूर नहीं करोगे

तब तक यह परायों के चक्कर में

खु़द खड़ी हुई गलतफहमियां

न धराशायी हो पाएंगी।

कोशिश तो खुद ही करनी होगी साहब!

गैरों के भरोसे किसके घर बसे हैं?

ये समझना होगा साहब! Copyright © Rachana Dhaka

Published by Rachana Dhaka

I am a law student, a resilient defender of Human Rights, a nomad who loves to know about different cultures and connect them for the better future of mankind and loves to talk to people through poetry or with some write ups. And best of all i love to motivate people and spread happiness around :)

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