Farmers at fields and Soldiers at Borders -खेत पर किसान और सीमा पर जवान

“खेत पर किसान और सीमा पर जवान”
यही हाल है मेरे भाई, कि भले हमारे में से बहुत से लोग शहर में रह कर या तो असलियत से अनभिग्य हैं या भूल जाते हैं या सच जानना नहीं चाहते, इसलिए कयी बार सुनकर दुःख होता है कि किसान और जवान भी हमारी तरह सिर्फ नौकरी करते हैं।
मगर
सच ये है कि किसान और जवान का इस काम को करने का जज्बा अलग होता है और ये हर किसी के बस की बात नहीं इसीलिए आज हमें ये दोनों ही चीजें रोजगार विकल्प या career option के रूप में नजर नहीं आतीं हैं।
कहना बहुत आसान है भाइयों लेकिन उनमें कुछ तो हमसे बहुत अलग और विशेष है जो आज भी उनको खेत और राष्ट रक्षा से जोडे रखा है, सिर्फ नौकरी या पैसा कमाना मकसद होया तो यकीनन वो ये काम तो नहीं कर रहे होते, क्योंकि ये दोनों ही काम बडे़ घाटे के सौदे हैं।
और जिस दिन वो भी इन मेरे ऐसे कहने वाले शहरी दोह्तों की तरह सोचने लगे ना तो यकीन मानो दोस्तों हम सब भुखमरी और दशहत से ही मर जाऐंगे।
इसलिए
अब हमें खुद से भी पहले किसान और जवान को मरने से बचाना होगा, उनके अधिकार के लिए लड़ना होगा, क्योंकि यही हमारे भविष्य की बुनियाद हैं।

अब बात करते हैं फोटो की – तो युवाओ से कहना चाहूंगी कि धर्म और जाति के नाम पर हो रही लड़ाई के बजाय एक बार हमारे किसानों के भी हालात देख लें|
मेरे एक किसान भाई श्री राजेश कुमार ने सही कहा है कि-
“कैलेंडर पर लिखा अंक का समीकरण हर साल बदल जाता है लेकिन नहीं बदलते तो इन किसानों के हालात| हाड कंपा देने वाली ठंड में जब आप रजाई में होते हैं तब किसान रात को जाग कर आवारा जानवरों को भगा रहा होता है| किसान देश और दुनिया के मानवीय मूल्यों को एक धागे में जोड़ता है और पुरे संसार के लोगो के खाने-पीने के लिए सब्जी ,फल और अनाज अपने कठिन परिश्रम, त्याग और तपस्वी जीवन से, विषम परिस्थितियों में पैदा करता है| लेकिन अफसोस किसानों के बच्चे रातों रात सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर अनेकों मुद्दे गूंगी बहरी सरकारों तक पहुंचाने का काम करते हैं लेकिन अपने हालात बयाँ करने में आखिर इनके हाथ क्यों काॅप जाते हैं?”

सही है आज हम किसानो के बच्चे भी इस पेशे से दूर भाग रहे हैं और निराश होकर आवाज़ उठाना भी बंद कर दिया है. याद करो लगभग हम सबके पूर्वज आज़ादी के समय या थोड़ा पहले तक किसान ही थे बाकि सब पेशे तो अब चलन में आये हैं और हम इतना जल्दी उनकी पीडा को भूल भी गए.
खैर उनकी पीड़ा भूल भी जाये तो भी नहीं भूलना चाहिए की वो अन्नदाता हैं और हमने उनको ऐसे ही मरने दिया तो यहाँ अनाज फैक्ट्री में तो बनने वाला है नहीं फिर भूखो ही मरेंगे.
और उधर इन किसानो के बेटे हमरे देश के सपूत सीमा पैर मर रहे हैं क्योकि हिंसा एवं अराजकता अंदर फैली है और फायदा बाहर वाले उठा रहे हैं.

आज युवा दिवस पैर यही निवेदन है आपसे कि उठो जागो और अपने वास्तविक लक्ष्य को पहचानो फिर उसे प्राप्त करो, उसके पहले न आराम करो.

और ऐसा करने हेतु हमें हमारी बनियाद जोकि किसान और जवान हैं उनको बचाना होगा ताकि हमारा देश बचे, फिर शिक्षा, स्वस्थ्य एवं अन्य आवश्यकताओं की बात कर पाएंगे, अन्यथा नहीं. क्योंकि वो हैं तो हम हैं.

Copyright © Rachana Dhaka

11 Comments

      1. It was in the title. It stuck out. 🙂 I’m glad you didn’t mind. English is my second language as well and I, too, appreciate an input from others regarding my English texts. Have a nice day, Rachana.

        Liked by 1 person

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