टूटे दिल किर्चो को समेटकर Assembling the broken pieces of my heart

Description in English- This poem is about ‘Assembling the broken pieces of my heart, in the hope that one day the hero will talk to the heroine and she tries many ways to make him happy and bring the earlier beautiful connection of their hearts back and in that try he keeps on breaking her heart but she loves him truly so finally she leaves him on his condition to realise on his own since many times people do not understand till the time those who are caring for them are around but they feel it when they leave them, but she still hopes that he will understand the truth on day and also she realises that in this process she had lost her importance so now she tries to gain herself back)

हर बार टूटे दिल के
बिखरे किर्चो को समेटकर
किसी तरह कतरा कतरा
खुद को खुदी से जोड़कर
करती हु बस कोशिश
किसी तरह फिर जुड़ जाए
ये टूटे दिलों की तारें यही सोचकर
रखती हूँ खुद को बस सम्हाल कर
जाने कब वो दिन लौटेंगे बहार के
कब वो पुराने पंछी आएंगे
फिर इन टहनियों पर घोसले बनाएंगे
जाने कब आएगा वो मौसम
गुलाबी फ़िज़ाओं औ’ मस्त हवाओं का
जाने कब रूठे मानेंगे
जाने कब दोस्त वापिस आएंगे
जाने कब उदासियों के पहरे हटेंगे
जाने कब खुशियों की बरसते आएगी
पर उम्मीद अभी भी बाकि है
दिल की अँधेरी गलियों में
अभी भी रौशनी की किरण बाकि है
आएगी रौनकें लौटकर एक दिन
बस इसी आशा के सहारे
हर दिन खुद से कहती हूँ
शायद ऐसे मनाऊ तो मान जाये
शायद वैसे मनाऊ तो मान जाये
मगर मीरा मीत भी जाने
किस मति, किस माटी का बना है
रब की लीला रब ही जाने
इतना हटी भी क्या कोई होता है
नसीब से मिलते हैं हम से हमसफ़र भी
ऐसा ही हर कोई कहता है
मगर जाने बस ये एक है जो
हर रोज ही दिल तोड़ देता है
जाने हम भी किस माटी के बने हैं
कि जबसे इससे दिल लगाया है
कितनी बार टूटा है
फिर भी हमीं ने इसको मनाया है
शायद हम ही भूल गए हैं
खुद की क़द्र करना
तभी इसको लगता है कि
सस्ते में मिल गए है
पता ही नहीं चला कि
हमने कब इतना धैर्य पा लिया
खुदाया सब्र के हमारे अब
और कितने इम्तिहान लेगा
बस कर बहुत हुआ अब
और न जोड़ पाएंगे हम
किरचे किरचे ही रहने दे अब
और न टूट पाएंगे हम
किसी को भी कभी तो
ज़रूरत पड़ेगी हमारी
तो खुद हो आएगा जोड़ेगा
बस अब और नहीं जग हंसाई
न लेगा अब कोई खबर तुम्हारी
न करेगा कोई खिदमत तुम्हारी
जब याद आये आ जाना
जब दिल से कर सको क़द्र हमारी
हर टूटे किरचे में पाओगे
अक्स तुम्हारा ही
चाहे जितनी गलतफहमिया रखो
भूल तो तुम भी न पाओगे कभी
एक दिन तो धुंध हटेगी ही
एक दिन तो सूरज चमकेगा ही
जब निशा के बाद उजियारा आएगा
सब तुम्ही को साफ़ साफ़ नज़र आएगा
उस दिन पूछेंगे अब तुमको
कि कौन सच्चा और
कौन झूठा नज़र आएगा
गुज़ारिश है इतनी कि
इतनी भी बेरुखी न पाल लेना
नहीं तो उस दिन खुद ही का
कद छोटा नज़र आएगा
अपना ही ओहदा सब
गौण मालूम हो जायेगा
थोड़ा तो पानी बचा के रख
नहीं तो चेहरा सब सून हो जायेगा

Copyright © Rachana Dhaka

Published by Rachana Dhaka

I am a law student, a resilient defender of Human Rights, a nomad who loves to know about different cultures and connect them for the better future of mankind and loves to talk to people through poetry or with some write ups. And best of all i love to motivate people and spread happiness around :)

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