नीराज : कैंसर से जंग जीतने वाली फुटबाल गर्ल

*English translation coming soon in next post.

टूटे हैं, मगर हौसले अभी जिंदा हैं।
हम वो हैं, जहां मुश्किलें शर्मिंदा हैं।
जी हां! आज हम बात करने जा रहे हैं ऐसी एक बच्ची नीराज गुर्जर के बारे में जो नन्हीं सी उम्र में कैंसर से जीवन की
जंग जीत कर आई है.
एक नन्ही सी जान देश के एक जिले अजमेर (राजस्थान) के छोटे से गांव हासियावास में कहीं अपने माता-पिता के
आशीर्वाद के साए तले सपने बुन रही थी। विद्यालय जाना शुरु किया वहां बच्चों को खेलते दौड़ते देखा तो खुद का भी
मन किया. गांव में महिला जन अधिकार समिति की बहन आई, स्कूल की लड़कियों को फुटबॉल सिखाने की बात
की तो बच्चियां सहम गयीं।
घर वालों को मनाने के लिए इस टीम की दीदियों को ले गए. गांव वालों को लगा कि कहीं बच्चियों को खेल के बहाने
ले जा कर यह लोग कहीं बेच ना दें इसलिए थोड़ा वक्त लगा समझने में, मानने में।
फिर शोर्ट्स में खेलना गलत माना गया इसलिए सूट में ही खेलना शुरू किया। नीराज भी खेलने लगी, अपने से बड़ी
उम्र की लड़कियों को देखकर ……..और धीरे-धीरे ये खेल उसकी जिंदगी बन गया।
आज नीराज अपने गांव में फुटबॉल के पर्यायवाची के रूप में जानी जाती हैं।
यहां तक तो सब ठीक था मगर यह कहानी शुरू होती है तब जब खेलते खेलते वह थकने लगी, अचानक से उसके पैरों
में दर्द शुरू हो गया और छुप-छुपकर वह दर्द की गोलियां खाने को मजबूर हो गयी। क्योंकि फुटबॉल के बिना उसे
जीवन सूना दिखाई देने लगा था. खेल के बाद ही वह पढ़ाई करती थी, एक और सपने को पूरा करने के लिए और वह था
आईपीएस बनने का सपना।
इसलिए आठवीं क्लास के बाद नवोदय स्कूल की परीक्षा की तैयारी करने गई, वहां पैर दर्द ज्यादा हुआ। पहले तो
डॉक्टर ने इंफेक्शन बताया, अजमेर में ऑपरेशन कराया, पर दर्द बढ़ता गया तो डॉक्टर ने कैंसर बताकर, जयपुर
जाकर केंसर अस्पताल में चेकअप करने की सलाह दी।
जब कैंसर हॉस्पिटल में गए तो उसे मालूम पड़ा कि जीवन का असली संघर्ष तो अब शुरू हुआ है।

मगर वह कहां रुकने वाली थी; उसे भी जीना था और जिंदगी से जंग शुरु हो गई उसकी!! उसे तो
कैंसर से भी ठीक उसी तरह लडना था जैसे मैदान में फुटबॉल गोल करने के लिए लड़ती थी। चार कीमो थेरेपी भी हो गई; फिर कैंसर का ऑपरेशन!! …….फिर से चार
कीमो थेरेपी से जूझती हुई बच्ची – माता पिता के पास इन सब के लिए पैसों का इंतजाम भी नहीं। पर,
उन्होंने भी सोच लिया कि चाहे थोड़ी सी जमीन है वह भी बिक जाए मगर बेटी को बचाना है। यह बच्ची
खुद ही मां-बाप को हौसला देती और अस्पताल में आसपास के लोगों, दर्द से कराहते मरीजों को कहानियां
और चुटकुले सुनाकर, दवाई और खाने का ख्याल रखते हुए हिम्मत देती .
और वार्ड में हर कोई उसे “फुटबॉल गर्ल” नाम से बुलाता था। आज भी वह मरीज और डॉक्टर साहब के साथ फोन
पर बतिया लेती हैं। नवम्बर 2019 में लास्ट थेरेपी हुई थी. ऐसे उम्मीद की जा रही है कि अभी कैंसर तो
चला गया लेकिन वह दौड़ नहीं पा रही है। हालांकि डॉक्टर का कहना है कि वह दौड़ पाएगी और उसका हौसला भी
उससे कहता है कि –
अभी तो असली मंजिल पाना बाकी है……… अभी तो इरादों का इंमतिहान बाकी है
अभी तो तोली है मुट्ठी भर जमीन……. अभी तो तोलना आसमान बाकी है।
बीच में…..बार बार टूटती है, फिर सम्हलती है और सपने बुनती है। कभी-कभी बच्चों को बाहर खेलते दौड़ते देखती है
तो खुद के लिए दुःखी होती है, पर फिर खुद को उम्मीद देती है कि अब वह आईपीएस नहीं तो आईएएस बनेगी।

उसका परिवार और उसकी दोस्त रोज उससे मिलते…….. बात करते हैं. फिर उसमें हिम्मत आती है और नन्ही
चिड़िया फिर उठ खड़ी होती है और फिर से उड़ने की कोशिश करती है!!
जुलाई के अंतिम शनिवार पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज, जयपुर एवं महिला संस्थाओं से जुड़े
साथियों ने नीराज से बात की….. उसे उम्मीद दी कि हम उसके साथ हैं और उसने भी अब फुटबाल के
अलावा अपनी पढ़ाई, अपना स्वास्थ्य और खेलने के अन्य ऑप्शन को सीखने पर ध्यान देना और आगे
बढ़ने का वादा किया।
जीवन के उतार-चढ़ाव में कभी कभी ऐसा होता है। मजबूत इच्छाशक्ति ने ही नीराज को कैंसर से जीतने और दसवीं में
77% अंक लाने की हिम्मत दी है। इसके अलावा एक और खूबी है हमारी फुटबॉल गर्ल में और वह है ड्रॉइंग यानि चित्रकारी।
इस फुटबॉल गर्ल की सगाई तो बचपन में ही हो गई थी जब दीदी की शादी की गई। मगर उसकी
समझदारी से उसने अभी अपनी शादी और छोटे भाई की सगाई न करने हेतु माता पिता को मना ही
लिया। यही नहीं, नीराज और उसके दोस्तों ने वर्ष 2016 में अपने एक से आठ कक्षाओं वाले विद्यालय
के 182 छात्रों पर मात्र दो अध्यापक होने के कारण अध्यापकों की पूर्ति की मांग की और ऐसा नहीं होने
पर उन्होंने स्कूल में सामूहिक टी. सी. अप्लाई करने और तालाबंदी कर आंदोलन किया। जिससे उनको
ज्यादा अध्यापक मिले और सतत प्रयास से इस वर्ष विद्यालय भी दसवीं तक क्रमोन्नत हुआ है। उसकी
कुछ दोस्त सपना, पूजा, ममता, सुमन से भी हमने बात की. जिन्होंने 12वीं में 90% से 95% तक अंक
पाए हैं। बारहवीं तक पढ़ने के लिए उनको बस से 15 किलोमीटर दूर दूसरे गांव जाना पड़ता है। और अब
वे आगे कॉलेज पढ़ने अजमेर जाएंगे. परंतु निर्धनता के कारण कभी-कभी सोचने को मजबूर हो जाते हैं
कि आगे पढ़े तो कैसे?
उन्होंने बताया कि उनकी बाल विवाह के खिलाफ जंग और फुटबॉल खेलने हेतु संघर्ष तो होश संभालने के साथ ही
जारी हो गया था। शुरू में 2015 में एक सामाजिक संस्था मजअस के लोग उनके विद्यालय में आए उनको स्वास्थ्य
और बाल विवाह के बारे में जानकारी दी। 2016 में फुटबॉल खेलने के बारे में पूछा, घरवालों को भी मनाया। शुरू में सब
डरे हुए थे फिर धीरे-धीरे विश्वास हुआ। जब गांव में लड़के उनको सार्वजनिक ग्राउंड पर नहीं खेलने देते थे तो उनसे भी
समय को लेकर नेगोशिएट किया कि 5:00 बजे तक वो खेलेंगे फिर तुरंत उनके लिए मैदान खाली कर दिया जाएगा।
नीराज की टीम ने 2 साल से निर्णय कर रखा है कि वह किसी भी बाल विवाह में शामिल नहीं होंगी और उनकी टीम के
50% लड़कियों की की सगाई हो चुकी है मगर शादी वह बालिग होने के बाद ही करेंगे।

इनके गांव में बावनी का रिवाज है यानि 52 गांवों को मिलकर सामूहिक सार्वजानिक कार्यक्रम में बहुत सी
शादियां एक साथ कर दी जाती हैं। परंतु जागरूकता बढाकर इन्होंने अपने घरवालों को मना लिया। दोस्तों ने बताया
कि इस सबको हंसाने वाली फुटबॉल गर्ल के जीवन में एक मोड़ ऐसा भी आया जब वह मरना चाहती थी, चारों तरफ
उसे सिर्फ अंधकार दिखाई देता था क्योंकि पैर दर्द के कारण खेल नहीं पा रही थी परंतु फुटबॉल ने जो टीम स्पिरिट
सिखाई उसने सबको जोड़े रखा और उसे हौसला दिया।
नीराज टीम का केंद्रबिंदु थी – वह एक चतुर मिड-फील्डर है. उनकी टीम ने बहुत से स्टेट गेम्स,
रीजनल गेम्स खेले हैं। अंडर फोर्टीन नेशनल टीम का हिस्सा भी रहे, परंतु इस बार कोरोना के चलते अंडर 17 नेशनल
गेम्स के सलेक्शन कैंप में आमंत्रण पाकर भी भाग नहीं ले पाए। जयपुर की महिला एवं मानवाधिकार संस्थाओं की
बहनों विजयालक्ष्मी जोशी, ममता जेटली, अलका राव, इंदिरा पंचोली, रचना ढाका आदि से बात करके नैराज ने
बताया कि उसे अच्छा लगा, उत्साहवर्धन हुआ और आगे भी पढ़ाई करके आईएएस बनने व अन्य गतिविधियों को
सीखने पर ध्यान देना चाहती हैं।
बीमारी के इलाज पर खर्च की वजह से नीराज के परिवार पर कर्जा बहुत बढ़ गया है और इन बच्चों को निर्धन परिवार
से आने की वजह से आगे की पढ़ाई के खर्चे हेतु भी सौ बार सोचना पड़ता है. इसे तो कोई व्यक्तिगत या संस्थागत रूप
से नीराज और उसके दोस्तों को आगे की पढ़ाई में सहायता करना चाहे तो हमसे संपर्क कर सकता है।

Published by Rachana Dhaka

I am a law student, a resilient defender of Human Rights, a nomad who loves to know about different cultures and connect them for the better future of mankind and loves to talk to people through poetry or with some write ups. And best of all i love to motivate people and spread happiness around :)

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