आज़ादी की सालगिरह और मायने

मनाली हमने, एक और सालगिरह हमारी स्वतंत्रता की, देशभक्ति गाने गाकर, तिरंगा फिराकर, भारत माता की जय बोलकर।
परंतु क्या कभी सोचा है, खुद से पूछा है कि आजादी के मायने क्या होते हैं या क्या यहीं पर हमारी जिम्मेदार नागरिक होने का कर्तव्य पूर्ण हो जाता है?
ये सब जवाब हमारे अंदर हैं लेकिन खुद से सवाल करना दुनिया का सबसे कठिन कार्य है।
बंधु! कभी खुद से प्रश्न करिए कि क्या आजादी केवल एक विदेशी आक्रांता से होती है या मानसिक गुलामी से भी हमें आजादी चाहिए होती है?
जो हम सदियों से आडंबर की आड में ढोते आ रहे है।
नहीं।
वास्तव में,
अपनी अभिव्यक्ति और विचारों को प्रतिष्ठित करना, बराबरी का हक, बिना डर के जीना, हर इंसान को समान मानकर इस देश को बिना किसी दबाव या भावनात्मक ब्लैकमेल के चलाना आजादी है।
और हमारी आजादी के कर्णधारों गांधी,तिलक, भगत सिंह, आजाद, सुभाष से लेकर नेहरू, पटेल, अरूणा आसफ अली, सरोजिनी, सावित्रीबाई फुले, अंबेडकर आदि के आदर्शों से सीख कर आजादी को सही मायनों में साकार करना स्वतंत्रता है।
मैंने इन सब लोगों का नाम इसलिए लिया क्योंकि कुछ तो बात रही होगी तभी इनको आजादी की अग्रणी आवाज माना गया था और हां! बिना शक़ हमें हमारे मजदूर और किसान भाइयों के गुमनाम मगर बड़े पैमाने पर योगदान करने को याद रखने के उतनी ही जरूरत है, जितनी यह याद रखने की कि हमारे देश में विपक्ष मर चुका है, लेकिन असली विपक्ष जनता होती है इसलिए हमें हमारी सरकार या हमारे जनप्रतिनिधियों के निर्णय पर सवाल करने की जिम्मेदारी को भी सचेत होकर निभाने की जरूरत है, तभी हमारे क्रांतिकारियों के संघर्षों को सच्ची श्रद्धांजलि होगी और हमारी सही स्वतंत्रता।
वैसे एक बात है हम याद तो सब रखते हैं परंतु चूक तब होती है, जब हम उनके योगदान और लक्ष्य को सही अर्थों में न समझने की भूल कर जाते हैं।
आजादी हमें मिली थी नए सपने देखने, खुली हवा में सांस लेने, आने वाले कल को बेहतर बनाने के लिए, गलत के विरुद्ध आवाज उठाने, सब की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति करने, संसाधनों के शांतिपूर्वक एवं न्याय पूर्ण बंटवारे के लिए।
परंतु, हमने क्या किया? जिसकी लाठी उसकी भैंस या गोरे गए तो भूरे आए।
पहले तो पराए अत्याचार करते थे, परंतु अब हमने ही अपने बंधुओं पर अत्याचार करना शुरू कर दिया।
वह भी उन बहन भाइयों को जो हमारी संस्कृति प्रकृति, धर्म, हर चीज के संरक्षक रहे हैं।
फिर, आज तक हमारी आधी आबादी को तो हमने, धर्म के नाम पर, संविधान में दिए गए समानता के अधिकार से भी वंचित कर रखा है और वह अधिकार है अभिव्यक्ति का।खुलकर बोलने, हंसने का, अपने विचार रखने का, आज भी हमारी बहनों को अधिकार नहीं है।
आखिर क्यों? हमें आज इस आजादी की सालगिरह के अवसर पर यह सोचने की जरूरत है, कि वो कौन सा डर है जो हमें इस कदर खाए जा रहा है जो हम सत्ता के नाम पर या मर्दानगी के नाम पर, औरतों के विरुद्ध अपराध की सजा बढ़ने के बावजूद, कठोर कानून आने के उपरांत भी, उन्हें सुरक्षित समाज देने में विफल रहे हैं और हर जगह उन्हें नोच कर खा जाने वाले गिद्ध तैयार बैठे हैं।
और आखिर वो कौन सी सत्ता का लालच है जो हम हमारे जल, जंगल, पर्यावरण का संरक्षण करने वाले आदिवासी बंधुओं को अधिकारों व नागरिकता से बेदखल करने और उनके ही नहीं हमारी भी आने वाली पीढ़ियों तक के संसाधनों को नष्ट करने पर तुले हैं?
अगर आप जवाब चाहते है तो हमें समझना होगा कि इन सब सवालों के जवाब हमें तभी मिल सकते हैं जब हम अपनी गुलाम मानसिकता से आजाद होकर सोचेंगे।
तभी हमें सच्चे अर्थों में आजादी मिलेगी और तब ही हमारे रणबांकुरे की को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
जय हिंद, जय भारत !!

Published by Rachana Dhaka

I am a law student, a resilient defender of Human Rights, a nomad who loves to know about different cultures and connect them for the better future of mankind and loves to talk to people through poetry or with some write ups. And best of all i love to motivate people and spread happiness around :)

5 thoughts on “आज़ादी की सालगिरह और मायने

  1. गुलाम एक दिन में नही हो गए थे और आजादी भी एक दिन में नही मिली थी।सामाजिक,बौद्धिक,राजनीतिक,आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक आजादी भी एक दिन की बात नही। आवाज उठते रहेंगे और उठना भी चाहिए और सबसे आजादी धीरे धीरे मिलती जाएगी।
    ये बात सत्य है कि आज
    आजाद होकर भी हम आजाद नही,
    कोई अकेला पैदा हुआ उसे जातियों से जोड़
    उसका हक मार किसी और को दिया जा रहा है।
    सती सावित्री को अपना पति चुनने का अधिकार था आज उसके पैरों में बेड़ियां लगी है।
    हिन्दू-मुस्लिम के नाम पर इंसान मिटाए जा रहे हैं और वोट बैंक की खातिर नेता मौन,कश्मीर देखिये,असम,बंगाल देख लो।
    आडम्बर में जीनेवाले दूसरे को आडम्बर क्या इसका उपदेश दे रहे हैं।
    धर्म जीना सिखाता लोग अपनी मर्जी से उसमें आडम्बर डाल रहे और हम बन रहे बेवकूफ।
    कौन कहता दहेज दो,
    कौन कहता भोज करो,
    कौन कहता मंदिरों की सीढ़ियां चढो,
    आज मंदिर में लोग नजर नही आते और मस्जिदों में पांव रखने की जगह नही,
    सड़को तक आ गए वे
    मगर एक भी ऐसा नही जिसे वहां आडम्बर दिखाई दे।
    90% परसेंट लाकर भी शब्जी बेचे कोई मगर कोई नही जिसे उसका दर्द दिखाई दे।
    आज आजादी की बातें करनेवालों के चरित्र बदल गए हैं।
    अगर हम आवाज उठाएं तो देश बिखर जाएगा
    और मौन रहें तो
    हम मिट जाएंगे।

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