शेखावाटी के शिक्षा संत स्वामी केशवानंद !!

आज हम बात करने वाले हैं शिक्षा संत स्वामी केशवानंद जी की।
उनको शत-शत नमन🙏🙏 करते हुए मैं आगे बढ़ती हूं। युगपुरुष स्वामी केशवानंद को याद करना इसलिए मुझे जरूरी लगता है क्योंकि उन्होंने अशिक्षा के घनघौर तिमिर से आच्छादित हमारे सुदूर ग्रामीण रेगिस्तानी इलाकों में शिक्षा की ज्योति 📖 जला कर ऐसी दामिनी 💡 प्रज्वलित की कि आज हमारा सीकर शिक्षा के क्षेत्र में अग्रणी जिला बनकर उभर रहा है।
आपने हमारे क्षेत्र में शिक्षा व न्याय के प्रणेता के रूप में, अंधविश्वास, रूढ़ीवादी परंपराओं जैसे गुलामी, दहेज प्रथा, नशा वृत्ति, मृत्यु भोज, छुआछूत आदि अनेक कुरीतियों के विरोध में आंदोलन का आगाज किया। हालांकि आज भी हम इन कुप्रथाओं के नागपाश से पूर्णतः मुक्त नहीं हैं, परंतु आप की प्रेरणा से बहुत सारे लोग इनका अवांछित बोझा छोड़कर शिक्षा की ओर अग्रसर हो रहे हैं।
हमारे शिक्षा संत, इस महान् तपस्वी स्वतंत्रता सेनानी का अवतरण पोष माह में सीकर जिले की लक्ष्मणगढ़ तहसील के गांव मंगलूणा के एक निर्धन किसान परिवार में हुआ।
आप का बचपन का नाम बीरमा ढाका रहा है। आप की माता का नाम सारा देवी और पिता का नाम ठाकरसी था।जीवन यापन हेतु पिता ऊंट रखा करते थे और सन् 1889 में उन्होंने दिल्ली, कोलकाता, मुंबई जाने वाले सेठों का सामान ढोने का काम शुरू किया। एक दिन ऊंट को बीहड़ में छोड़ने जाते समय उन्होंने अंतिम श्वांस ली।
1891 तक आपकी मां सारा देवी सेठों का आटा पीस कर और घरेलू काम करके जीवन यापन करती रहीं फिर वापस मंगलूणा गए, जहां किसी ने परिवार का सहयोग नहीं किया और ना ही काम मिला। तो सब हामूसर में मौसी के यहां गए, मां गांव भर का आटा पीसतीं और बिरमा अपने फुफेरे भाई रामलाल के साथ पशु चराते। रामलाल उन्हीं के साथ रहते थे क्योंकि जन्म के कुछ दिन बाद ही उनके माता पिता का देहावसान हो गया था।जैसे-तैसे गुजारा चल रहा था परंतु होनी को कौन टाल सकता है?
काल की काली छाया मंडराने लगी, मनुष्य बारिश की बूंद तक के लिए तरस गया, कुओं में पानी 300 फीट से भी नीचे चला गया और वो भी खारा, जिससे आदमी को उल्टी दस्त और गायों को मौत नसीब होने लगी।
ऐसे में सारा देवी को फिर पड़ाव बदलना पड़ा।
भाई रामलाल उनको छोड़कर अपने पुश्तैनी गांव चला गया। माता पुत्र अकेले भटकते रहे, रास्ते में डोर भी मरते गये, अगर उस समय के समाज की तस्वीर का जिक्र करें तो निर्धन ग्रामीण कृषक सामंतों, राजाओं और विदेशी शासकों का गुलाम था। ऊपर से यह छप्पनिया अकाल जो संवत् 1956 में आया था (सना 1898-99 में) अशिक्षा और रूढ़िवादी परंपराओं में पिसता आम आदमी।
गर्मी – सर्दी में गरीब बूढ़ी मां के साथ 16 साल तक रेतीले टीलों में नंगे पांव ठोकरों भरा जीवन काटा।
असमय कालकलवित होते प्राणी, भूख प्यास से विचलित हो पेड़ों की छाल और भंरूट घास के कांटे खाने को मजबूर लोग और उन्हें खून के आखिरी कतरे तक चूसने को आतुर जागीरदार और शासक। ऐसे में मां का कमजोर शरीर और दुःखी मन अंतिम यात्रा पर चल पड़ा। अपने अंतिम सहारे कं खोकर केलनिया गांव में उनका मन न लगा।
तो यह अबोध बालक बचे हुए पशुओं के साथ अथाह रेतीले समुद्र में साहिल की तलाश में निकल पड़ा।

शिक्षा
इस इतिहास के सबसे बड़े अकाल ने बीरमा को अन्य युवा रहवासियों की तरह रेगिस्तानी क्षेत्र छोड़ने और आजीविका हेतु पंजाब कूच करने को मजबूर कर दिया।
वहां ‘उदासी संप्रदाय’ के महंत ‘कुशलदास’ से उनका संपर्क हुआ। जिनसे उन्होंने संस्कृत सीखने की इच्छा व्यक्त की। उन्होंने सलाह दी कि जाट जाति के रूप में उन्हें कोई संस्कृत नहीं सिखाएगा इसलिए सन् 1904 में बीरमा संन्यासी (संत) बन गए, हालांकि वे पाखंडी संतों की वज़ह से पहले इसके लिए तैयार नहीं थे परंतु संस्कृत सीखने की ललक ने ऐसा करने को मजबूर कर दिया।
उन्होंने साधु आश्रम फाजिल्का (पंजाब) में शिक्षा प्राप्त की, जहां हिंदी, गुरुमुखी और संस्कृत भाषाएं सीखीं। सन् 1905 में प्रयाग कुंभ मेले में महात्मा हीरानंदजी अवधूत ने बीरमा को “स्वामी केशवानंद” नाम दिया।

स्वतंत्रता सेनानी
सन् 1919 का जलियांवाला बाग नरसंहार ने जन मानस पर गहरा प्रभाव डाला, स्वामी केशवानंद भी इससे अछूते नहीं रहे। इसी समय वे आर्य समाज के दर्शन से प्रभावित हुए। उन्होंने कांग्रेस की बैठकों में भी स्वतंत्रता सेनानियों के साथ भाग लेना शुरू कर दिया। इसके अहमदाबाद अधिवेशन में ‘खान अब्दुल गफ्फार खान’ से मुलाकात की। ‘पंडित मदन महान मालवीय’ ने भी उन्हें प्रभावित किया। उन्होंने 1919 में मदन महान मालवीय की अध्यक्षता में हुए दिल्ली अधिवेशन में भाग लिया। वे महात्मा गांधी के नेतृत्व में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हुए। महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन में भाग लेने के कारण, उन्हें 2 साल की कैद हुई और उन्हें फिरोजपुर (1921-1922) जेल में रखा गया। स्वतंत्रता आंदोलन में स्वामी केशवानंद की भूमिका इतनी महत्वपूर्ण हो गई कि उन्हें 1930 में उस क्षेत्र में स्वतंत्रता आंदोलन का संचालन करने के लिए फिरोजपुर जिले का अधिनायक (लीडर) नियुक्त किया गया। 1930 में उन्हें फिर से गिरफ्तार कर लिया गया, क्योंकि उन्होंने जज द्वारा माफी मांगने की बात पर उत्तर दिया कि बिना माफि के भी रिहाई होने पर वे फिर से आंदोलन में कूदेंगे। वहां उन्होंने अनुभव किया कि अगर हमारे भोले ग्रामिणों को अब शिक्षित न किया गया तो आजादी के बाद भी वे अपने अधिकारों से अनभिज्ञ गुलामी का जीवन जीने को अभिशप्त होंगे।

शिक्षक के रूप में कार्य
स्वामी केशवानंद, एक अनाथ, अनपढ़, खानाबदोश व्यक्ति थे, जिन्होंने कभी औपचारिक शिक्षा प्राप्त नहीं की, किंतु वे शिक्षा के महत्व से भलिभांति परिचित थे। परिणामतः उन्होंने 300 से अधिक स्कूलों, 50 छात्रावासों और असंख्य पुस्तकालयों, समाज सेवा केंद्रों और संग्रहालयों की स्थापना की।
1911 में, एक संन्यासी के रूप में ‘उदासीन दशनामी संप्रदाय’ में अपनी दीक्षा के कुछ वर्षों के अंदर, स्वामी केशवानंद ने सदन आश्रम फाजिल्का के परिसर के अंदर “वेदांत पुष्प वाटिका” पुस्तकालय शुरू किया।
वे हर वर्ष गुरू का आशीर्वाद लेने यहां आते बाकि वक्त देशभर के मतों, मंदिरों, प्राकृतिक स्तरों, गुरूद्वारों, में भ्रमण कर प्राकृतिक ग्यान का आचमन करते।
अगले वर्ष, उन्होंने उसी स्थान पर एक संस्कृत विद्यालय शुरू किया।
गुरू ने मठ उनके नामकर सन्यास ले लिया फिर उनका मन मठ में बैठकर चरण छुआने के बजाय शिक्षा कार्य में रम गया।
1932 में, स्वामी केशवानंद को जाट स्कूल, संगरिया का निदेशक बनाया गया, जो धन के आभाव में बंद होने के कगार पर था। वे चंदा इकट्ठा करने के लिए गाँव गाँव गए और बंद स्कूल को शुरू करने में सफल रहे।
सर्व धर्म समभाव में विश्वास रखने वाले स्वामीजी ने 1948 में इसका नाम बदलकर “ग्रामोत्थान विद्यापीठ”, संगरिया कर दिया गया।
इस विद्यालय के अंदर स्वामी केशवानंद ने दुर्लभ दस्तावेजों के एक बहुमूल्य संग्रह के साथ एक संग्रहालय विकसित किया। ग्रामोत्थान विद्यापीठ, संगरिया दूर-दूर के शिक्षकों के लिए एक प्रेरणा बन गया, आज भी यहां शिक्षकों को राजकीय प्रशिक्षण दिया जाता है।

समाज सुधारक
स्वामी केशवानंद एक महान सामाजिक कार्यकर्ता थे। वे हमेशा शिक्षा, सामाजिक और ग्राम उत्थान से जुड़े रहे। वे पंजाब में साहित्य सदन, अबोहर, फिरोजपुर जिले की स्थापना (1917-1932) से जुड़े थे। उन्होंने अबोहर शहर में हिंदी-फ़ोरम के साथ हिंदी का ज्ञान फैलाने उद्घोष किया।
उन्होंने 1920 में अबोहर में ‘नागरी प्रचारिणी सभा संस्थान’ की स्थापना की, जिसका नाम बदलकर साहित्य सदन, अबोहर रखा।


हिंदी के लिए उनकी सेवाएं
स्वामी केशवानंद ने 1933 में अबोहर में एक प्रेस (मुद्रणालय) “दीपक” शुरू किया और हिंदी भाषा में सामग्री प्रकाशित की और ग्रामीणों को मुफ्त वितरित की गई, ताकि उनकी पढने में रूचि बढे।
साहित्य सदन, अबोहर रवींद्रनाथ टैगोर के शांति निकेतन के साथ एक संस्थान के रूप में विकसित हुआ। उन्होंने 1941 में साहित्य सदन, अबोहर में 30वें अखिल भारतीय हिंदी साहित्य सम्मेलन का आयोजन किया। उन्हें 1942 में हिंदी के लिए उनकी सेवाओं को देखते हुए “साहित्य वाचस्पति” की उपाधि प्रदान की गई।

अपने वक्त से आगे सोचने वाले स्वामीजी ने दो अभूतपूर्व और अमूल्य कार्य किए, जो उस वक्त हमारी सरकारों और लोगों के स्वप्निल एहसासों से भी परे था।

एक यह कि सन् 1935 के आस पास ही उन्होंने कौशल या व्यावसायिक शिक्षा की शुरुआत कर दी थी जिसकी व्यापक तौर पर शिक्षा नीति के तहत पालना की अभी तक बातें ही हो रहीं हैं।

और दूसरा यह कि उन्होंने पंजाब की बहन सावित्री देवी के साथ मिलकर सन् 1950 में ही संगरिया में स्त्री शिक्षा की शुरुआत की और उनके लिए अलग से विद्यालय, छात्रावास और पुस्तकालय की व्यवस्था की।

सम्मान
स्वामी केशवानंद को 9 मार्च 1958 को राजस्थान के तत्कालीन मुख्यमंत्री द्वारा “अभिनंदन ग्रंथ” भेंट किया गया।
वे लगातार दो बार 1952-58 और 1958-64 में राज्य सभा के सदस्य रहे।
भारत सरकार के डाक विभाग ने 15 अगस्त 1999 को उनके सम्मान में एक स्मारक डाक टिकट जारी किया।
2009 में “स्वामी केशवानंद राजस्थान कृषि विश्वविद्यालय” का नाम उनके नाम पर रखा गया

13 सितंबर 1972 को उन्होंने महापरिनिर्वाण किया ।

Published by Rachana Dhaka

I am a law student, a resilient defender of Human Rights, a nomad who loves to know about different cultures and connect them for the better future of mankind and loves to talk to people through poetry or with some write ups. And best of all i love to motivate people and spread happiness around :)

3 thoughts on “शेखावाटी के शिक्षा संत स्वामी केशवानंद !!

  1. भारत में ना जाने कितने हीरे गुमनामी के अँधेरे में छिपे पड़े हैं ! एक अद्वितीय शख्सियत को उजागर करने के लिए धन्यवाद !

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