क्या चाहिए मुझे!!

नहीं चाहिए मुझे
काजल वाली सुरमयी अंखियां
मुझे चहिये
इन आँखों में झिलमिलाते सतरंगी स्वप्न
नहीं चाहिए मुझे
अपने सपनों के मरने की उदासी छिपाने के लिए पोते जाने वाला पाउडर
मुझे चाहिए

वो हिम्मत जो अश्रु का कारण ही मिटा दे
नहीं चाहिए मुझे
किसी को लुभाने के लिए अपने चेहरे पर लीपापोती
मुझे चाहिए

ऐसा साथी जिसके होने से मेरा चेहरा निस्तेज ही न हो और नैसर्गिक सौंदर्य झलक पाए
नहीं चाहिए मुझे
देवी की पदवी
मुझे चाहिए

अपने बोलने, कहने, सुनने, पढने, बढने का अधिकार
नहीं चाहिए मुझे देवता
मुझे पशुवत टोरने और चाकरी के लिए
मुझे चाहिए
एक जीवनसाथी जो हर कदम पर साथ चल सके
नहीं चाहिए मुझे
बीवी का गुलाम
मुझे चाहिए वो
जो पैसे से न सही पर मन से सहयोग करे और मेरे आगे बढने पर हर्षित हो
नहीं चाहिए मुझे
मैं और तुम में बांटने वाला समाज
मुझे चाहिए अपना
हम सब के साथ वाला समाज
वो बगिया जिसमें हर रंग के फूल खिले हों
नहीं चाहिए मुझे
जिस कोख से जन्मे उसी को लात मारने वाले रक्षक भक्षक
मुझे चाहिए
बराबरी में विश्वास करने वाले बंधु और साथी
नहीं चाहिए मुझे
बाहरी सौंदर्य का जादू
मुझे चाहिए अपने वज़ूद का एहसास
नहीं चाहिए मुझे
पल पल हिंसा का भय
मुझे चाहिए

स्वछंद हवा में उड़ान की सौगात

नहीं चाहिए मुझे

कि किसी के कंधों का बोझ बनूं

मुझे चाहिए कि

अपने पैरों पर खड़ी हो नसीब अपना खुद लिखूं

नहीं चाहिए मुझे

लड़कियों को नापने वाली दुनिया

मुझे चाहिए कि

मैं खुद अपने लिए न्याय और स्वतंत्रता की परिभाषा घड़ूं।।

Copyright @rachanadhaka

Published by Rachana Dhaka

I am a law student, a resilient defender of Human Rights, a nomad who loves to know about different cultures and connect them for the better future of mankind and loves to talk to people through poetry or with some write ups. And best of all i love to motivate people and spread happiness around :)

16 thoughts on “क्या चाहिए मुझे!!

  1. सच में हर स्त्री यही चाहती है…इसके लिये उन्हें स्वयं आत्मनिर्भर, आत्मरक्षक बनना होगा…आपकी कविता बहुत सुंदर व सार्थक है रचना जी✔👍

    Liked by 2 people

    1. आपका बहुत धन्यवाद। आपका कथन भी सत्य है कि आगे तो खुद ही आना होगा बस हम सबको इतना करना है कि वो समझे कि क्या सही क्या गलत है।

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  2. बहुत ही सशक्त रचना! उत्साहवर्धक ! महिलाओं के लिए संदेह कि स्वयं आत्मनिर्भर, आत्मरक्षक बनना होगा,साधुवाद आपको !

    एक कविता पढ़ी थी जिसका भाव था : पुरानी मान्यताओं में जकड़ी अपने को असहाय समझने वाली एक युवती औरों से मदद की आस लगाए है | उसी को ये लाइने कहीं मैंने :

    खुद भंवर बन

    किसी से भी आस की आस छोड़ दे
    स्वयं अपने तक़दीर की दिशा मोड़ दे
    प्रयत्न कर, जोश भरी हुंकार एक दे
    ना कर किसी भंवर का इंतज़ार
    खुद भंवर बन,अपनी बेड़ियाँ तोड़ दे
    -रविन्द्र कुमार करनानी
    rkkblog1951.wordpress.com

    https://rkkblog1951.wordpress.com/2020/02/25/खुद-भंवर-बन

    Liked by 2 people

    1. Wowwww… ये पंक्तियां सच में खुद को झकझोर कर बेड़ियां तोडने की ताकत देतीं हैं।
      Thanks for sharing Sir 🙏😊

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  3. वाह। बहुत ही बेहतरीन रचना। दिल से।लिखी गई शानदार रचना।

    नहीं चाहिए मुझे
    किसी को लुभाने के लिए अपने चेहरे पर लीपापोती
    मुझे चाहिए

    ऐसा साथी जिसके होने से मेरा चेहरा निस्तेज ही न हो।

    Liked by 2 people

    1. Thank you so much Sir 🙏🙏 आप जैसे मेरे सम्माननीय जन को मेरे प्रयास अच्छे लगे इससे बड़ी खुशी कोई नहीं 😊 आशीर्वाद बनाये रखें 🙏

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  4. महिला सशक्तिकरण को प्रस्तुत करती बहुत सुंदर कविता, साधुवाद। उज्जवल भविष्य की कामनाएं। आपकी लेखनी से सृजित कविताएं नारी के सम्मान व स्वाभिमान को दृढ़ता प्रदान करने का कार्य करें। वर्तमान परिस्थितियों में नारी को सहारे की नहीं बल्कि शक्ति की जरूरत है और आपकी कविता इस दिशा में एक सार्थक प्रयास है। पुनः साधुवाद।

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    1. आदरणीय,
      आपको मेरा प्रयास पसंद आया यह मेरा पुरस्कार है।
      आशीर्वाद व मार्गदर्शन बनाएं रखें।
      🙏🙏😊

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