क्या यह वाक्य सही है??

देखने में तो बहुत ही अच्छा लग रहा है।

और सब सही भी है। परंतु अंत में जाते ही ऊपर की पूरी बात का रुख ही बदल जाता है।

जैसे ही कहा ‘मदद’ करते हैं और किचन ‘तक’ में।

जब यह काम दोनों की साझी जिम्मेदारी है तो फिर मदद कहना तो उपहास है। मतलब एक जीवन साथी जिम्मेदारी से दूर है। और जैसे ही तक आ जाता है वैसे ही ऐसा प्रतीत होता है कि यह कोई निचले स्तर का काम है जिसमें एक की मदद कर दूसरा उस पर एहसान कर रहा है। जबकि काम का कोई दर्जा होता ही नहीं है हर काम उतना ही महत्वपूर्ण होता है।

और हम सोचते हैं घर का काम ओफिस वाले से छोटा है। बल्कि यह सिर्फ हमारी सोच का फर्क है जो ऐसा लगता है कि औरत को इसी जाल में उलझाने के लिए बुना है। 🤐 इससे बाहर आकर अगर हम सोचें तो जीवन और भी खूबसूरत नजर आएगा।

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