दुनिया के सबसे शानदार पुरुष, कौन?

दुनिया के सबसे शानदार पुरुषों की नायक रही
उनकी सरल हृदय माएँ
उन्होंने बनना चाहा उनसा ही प्रेमी और उदार

दुनिया के सबसे शानदार पुरुष
अपनी उदास दुल्हन लेकर लौटे भावुक और उदास
स्वागत में खड़े रिश्तेदारों से चुराते रहे नज़रें,
पोछते रहे अपनी आँखें।

दुनिया के सबसे शानदार पुरुष
अपनी बहनों के बालों में तेल डालते हुए
सुनाते रहे उन्हें पहाड़, नदी, जंगल, प्रेम और संघर्ष की गाथाएं

दुनिया के सबसे शानदार पुरुष
गोद में रख अपनी स्त्री के थके-रूखे पाँव
उकेरते रहे उनपर लाल-लाल फूल अपने हृदय के गाढ़े राग से

दुनिया के सबसे शानदार पुरुष
गूथते रहे गजरे, बनाते रहे चोटियां, लगाते रहे फूल
और अपनी स्त्री के नाखूनों को इंद्रधनुष के रंगों से रंगते रहे

दुनिया के सबसे शानदार पुरुष
चिट्ठी के मौन में भी सुन सके लिखने वाले की कराह
और रात-दिन का हिसाब किए बगैर
अपनी देह छीलकर की सबसे कठिन यात्राएं

दुनिया के सबसे शानदार पुरुषों ने
पर्दे के महानायकों की गूंजती आवाज़ों की नकल नहीं की
उन्होंने सावधानी से चुनी सबसे मीठी लोरियां और उन्हें घोल लिया अपनी आवाज़ में

दुनिया के सबसे शानदार पुरुषों ने
अपने जानवरों की सींगों में तेल चुपड़कर उनपर नहीं बांधे अपने-अपने धर्म के झंडे
उन्होंने उनके घायल पके खुरों से साफ किया मवाद,निकाले कीड़े और बदलते रहे पट्टी

दुनिया के सबसे शानदार पुरुषों ने
अपनी स्त्रियों की देहयष्टि पर नहीं लिखी कोई कविता
उन्होंने लिखा उनके बस्ते पर उनके सूर्य से दीप्त सांवले माथों पर और उनकी अन्याय के खिलाफ तनी मुट्ठियों पर

दुनिया के सबसे शानदार पुरुषों ने
अपनी मांसल भुजाएं आकाश में लहराकर बादलों को नहीं दी चुनौती
उन्होंने मिट्टी खोदी, गोबर चाला,धूल में लिथड़े, पानी ढोये, बीज बोए और बाड़ लगाई

दुनिया के सबसे शानदार पुरुषों ने
न्याय और समानता पर नहीं दिए ओजस्वी भाषण मुट्ठियाँ तान-तान कर
उन्होंने अन्याय के खिलाफ हर संघर्ष में थामी धू-धू धधकती मशालें और झुलसा ली अपनी करीने से सजी मूंछे

दुनिया के सबसे शानदार पुरुषों ने
प्रेम किया अथाह मगर प्रदर्शन की कला नहीं सीख पाए बाजार से

उन्होने औरत को सम्मान से बराबरी से देखा नहीं देखा बस शरीर सा

दुनिया के सबसे शानदार पुरुषों पर
उनके चुप्पे प्रेम के बदले लगते रहे आरोप, मिलती रही झिड़कियां, बरसते रहे ताने

हम स्त्रियां,
जो ग्रीक देवताओं की विशाल मूर्तियां अपने हृदय में स्थापित कर मुक्ति की बात करती हैं

हम स्त्रियां,
जो बाजार के सुर में सुर मिलाकर भी क्रांति के गीत गाना चाहती हैं
हृदय पर भारी पथरीली भुजाओं का बोझ लेकर कैसे पाएंगी मुक्ति ?
बाजार के झंडे लहराते हुए कैसे गाएंगी क्रांति के गीत ?

हमें मुक्ति की चाह से पहले खंडित करना होगा अपने गर्भगृहों में स्थापित इन पथरीली मूर्तियों को
घिसकर छोटी करनी होंगी मांसल भुजाएं और विशाल देहयष्टि वाली पौरुष की परिभाषाओं को
खारिज करना होगा रूप,रंग शक्ति और सामर्थ्य के नकली पैमानों को

कि हम शानदार स्त्रियां जिस सुंदर दुनिया के सपने देखती हैं उनमें
अब तक विस्थापित रहे दुनिया के सबसे शानदार पुरुषों के लौटने का समय है

संकलित

अंतरराष्ट्रीय पुरुष दिवस की बधाई।

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